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यात्रा वाराणसी

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मेरे एक कमरे के मकान में कोई ख़ास हवा नहीं आती। दीवार में एक खिड़की ज़रूर रहती है। बाहर दिखता है, हवा का एक समुंद्र फैला हुआ है, इसमें एक अंदरूनी लहर भी है। यात्री इस लहर में यात्रा करते हैं। जब नहीं करते तब हवा के समुंद्र में गहरी नींद सोते हैं। यात्रा में इस हवा रहित मकान से निकलने का भी आनंद है और वापिस आने का भी। मैं इस दीवार की खिड़की को बंद कर, दूसरी दीवार की गेट से निकल गया। गौर करें की मैने इस लेख का शीर्षक यात्रा वाराणसी लिखा है, न की वाराणसी यात्रा। क्योंकि इसमें यात्रा का उल्लेख ज़्यादा है और जगह का कम। किसी भी आम टैक्सपेयर की तरह मैने भी ट्रेन की टिकट खरीदने की हिम्मत की। एक मित्र भी साथ था इसलिए 2 टिकट लिए। रेलवे स्टेशन के लिए शहर से होते हुए जाना होता है। यहाँ पुल हैं और पुलों में घर रहते हैं। एक नंगा बच्चा अपनी माँ की पीठ पर लटका झूलता नजर आ रहा है। ट्रेन में बैठा तो पता चला की स्लीपर में 250-250 कि.मी. की टिकट लेना कोई बुद्धिमानी की बात नहीं है। टिकट और बिना टिकट सभी चिपक कर बैठे थे। सीट के किनारे हैंडलों पर एक बच्चा इधर-उधर कूद रहा था। मैं गेट की तरफ़ गया। वह...