दूर की नज़र


एक आदमी मुझे क्रेडिट कार्ड बेच रहा था, मैं भी खाली था तो सोचा उसकी दूर की नज़र दुरुस्त कर दूं| मैंने उसे बताया की मेरा आर्थिक व्यवहार उधार के काबिल नहीं है, माल्या और नीरव मोदी मेरे जैसे ही आदमी रहे होंगे, बस मैं मध्यम वर्ग का हूँ और वो अमीर| आदमी इस तुलना से प्रभावित हुआ, बोला आपका तो क्रेडिट स्कोर भी अच्छा होगा, आइये एक बार चेक कर लें, मैंने उसे बताया की मैं पैसे के लेके भाग जाऊंगा, इसलिए मेरा खाता कहीं नहीं चलता, उसने साफ़ साफ़ बोला की भागना हो तो भाग जाना, उसकी निजी दाइत्व लोगों को बैंक से जोड़ना है, और बैंक को लोगों से जोड़ना है, और कुछ भी नहीं!


और कुछ भी नहीं, शांति शांतिपूर्ण काम करने से ही मिलती है, जैसे लोगों को विचारों तक ले जाना, और विचारों को लोगों तक लाना| मुझे भी बस शांति चाहिए, क्रेडिट नहीं| मैंने उसे समझाया, पर उसने बताया, शांति क्रेडिट में है| धर्म करंट अकाउंट की तरह है, इसके काफी कुछ याद रखना पड़ता है, बड़े हिसाब से चलना पड़ता है, वहीँ क्रेडिट अध्यात्मिक है, इट्स स्पिरिचुअल, इससे आप सब कुछ भूल सकते है| मैंने टोका, हाँ बिलकुल भूल सकते है, परन्तु एक समय तक| हाँ पर उस समय की बाद भी एक शांति है, उसने बताया, जो इस एहसास में है, की दुनिया को आपकी ज़रूरत है, और आपको दुनिया की| मैंने पुछा, क्या हर अध्यात्मिक अनुभव अंत में धार्मिक हो जाता है, क्रेडिट का विलय भी करंट में हो जाता है| विलय ही सदभावना है, कम्पैशन और यथार्थ भी, उसने बोला| माहौल से व्यापार ख़त्म हो चूका था, अब केवल प्यार बचा था, मुझे भी लगा की यह आदमी अगर आम एग्जीक्यूटिव नहीं होता हो चीफ एग्जीक्यूटिव होता| शायद पहली बार मैंने किसी आदमी को इतनी देर तक देखा की उसमे मैं खुद को देख पा रहा था| द्रष्टा दृष्टी बन चुकी थी, “the observer is the observed”!


एक रूसी अपनी सभी सिगरेट यह कह कर पीता था की ये उसकी आखिरी सिगरेट है, बिना इस निश्चय के वो एक एक कश में बराबर का मज़ा नहीं खोज पाता है, उसने सोच लिया है, अच्छे दिन आने वाले है, पर बुरी आदतों का मज़ा तब तक है जब तक वो बुरी हैं, जितनी बुरी उतना मज़ा| जैसे प्रधानमंत्री का चुनाव के समय हिन्दू भावना के साथ प्रयोग, वह यह मज़ा आखिरी बार लेना चाहते है, इस चुनाव में, क्योंकि उनके खुद के अच्छे दिन आने वाले हैं| 2014 में उन्होंने इस भावना के हर एक कश का मज़ा लिया, पर वो अंत नहीं था, मुक्ति नहीं थी|  जैसे नोटबंदी, जिसे यह कह कर शुरू किया गया था की यह काले धन का अंत है, वो बाद में डिजिटल इंडिया की शुरुआत बन गई|


ऐसे ही प्रधानमंत्री के दोहरे चरित्र को धार्मिक और अद्यात्मिक में बांटा जा सकता है, मेरे एग्जीक्यूटिव मित्र की मदद से, जहाँ एक तरफ वो अपने भाषणों में प्रेम और भाईचारे के बंधन में बंधे हैं, तो वही दूसरी तरफ मेजोरिटी-माइनॉरिटी, हिन्दू-मुस्लिम, कब्रिस्तान-शमशान के सत्य से जुड़े हैं| इस द्वैतवाद के कई नाम है, कई चेहरे है, और एक एक दिल जितने वाले हैं| इन दोनों का विलय ही इनके लिए सदभावना की परिभाषा है, कम्पैशन! और इससे उपजने वाला यथार्थ?


इस यथार्थ की कई खूबी है, यह दूर की नज़र को दुरुस्त करता है, इसमें एक काल्पनिक भय है जो सच मुच के भय से ज्यादा मसालेदार है| वास्तविक भय बेरोज़गारी ने निकली हताशा है, पत्रकारों का क़त्ल, तो कहीं गाय से जुड़े उग्रवाद पे है, किसानो की बिगरती हालत| काल्पनिक भय अर्बन नक्सल जैसे शब्दों का है, नेहरु जी का भूत, इतिहास से जुड़े तथ्यों का है| इस मसाले ने मनोरंजन जगत का राजनीती में प्रवेश का रास्ता साफ़ किया है, जैसा की अमेरिका जैसे देश में हम देख चुके हैं|


पर लोग और समाज इस कल्पना को अधिक समय तक नहीं देख सकती, ज्यादा देर तक देखने से भी इसमें कोई अपने आप को नहीं देख पाता| माहौल का व्यापार हर चीज़ पर भारी है, दूर की नज़र करीब की लूट और धोकेबाजी को भले ही नहीं देख पा रही हो, पर यह लोग अपनी फूलती हुई लोकप्रियता को राह चलते क्रेडिट की तरह ही समझे, यह गुब्बारा कभी भी फूट सकता है|


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