धार्मिक इतिहास और मैं


 

           

धार्मिक इतिहास और मैं (मार्क्ड ईन येलो)

 

सुंदरकांड में एक प्रसंग है

जिसका जिक्र उंदर काण्ड में नहीं है

 

सुंदर काण्ड में पूछा  जाता है

मैं न होता, तो क्या होता?”

उंदर कांड का सवाल है की

मैं होता तो भी क्या घंटा फरक पड़ता?

अशोक वाटिका" में  जिस समय रावण क्रोध में भरकर, तलवार लेकर, सीता माँ को मारने के लिए दौड़ पड़ा, तब हनुमान जी को लगा कि इसकी तलवार छीन कर, इसका सर काट लेना चाहिये। यह सुन्दर काण्ड का दृश्य है

उंदर काण्ड तक मैं तलवार चलाना नहीं जानता था|

किन्तु, अगले ही क्षण, उन्हों ने देखा "मंदोदरी" ने रावण का हाथ पकड़ लिया !यह देखकर वे गदगद हो गये! वे सोचने लगे, यदि मैं आगे बड़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि यदि मै न होता, तो सीता जी को कौन बचाता?

शायर पप्पू प्रतापगढ़ी कह गए की

बहुधा हमको ऐसा ही भ्रम हो जाता है, मैं न होता, तो क्या होता ?

परन्तु ये क्या हुआ?

उंदर काण्ड में ऐसे दृश्य नहीं होते, ऐसे भ्रम जरुर पाए जाते हैं|

सीताजी को बचाने का कार्य प्रभु ने रावण की पत्नी को ही सौंप दिया! तब हनुमान जी समझ गये कि प्रभु जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं।

इस प्रैक्टिस का दुरूपयोग आम प्रभु यूँ ही ले लेते है| वो भी पूज्य है, खास दैत्य की रहमत से|

आगे चलकर जब "त्रिजटा" ने कहा कि "लंका में बंदर आया हुआ है, और वह लंका जलायेगा!" तो हनुमान जी बड़ी चिंता मे पड़ गये, कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नहीं है और त्रिजटा कह रही है कि उन्होंने स्वप्न में देखा है, एक वानर ने लंका जलाई है! अब उन्हें क्या करना चाहिए? जो प्रभु इच्छा।

हनुमान जी ने अपने पुलिस इंस्पेक्टर के करियर में कई केस सौल्व किये| जब एक धार्मिक केस आया तो आलाकमान से विमर्श कर उन्होंने समझा| “जो प्रभु इच्छा”। पुलिस व्यवस्था अपने धर्म पे आज तक कायम है और उनका ऐतिहासिक विमर्श भी|

जब रावण के सैनिक तलवार लेकर हनुमान जी को मारने के लिये दौड़े, तो हनुमान ने अपने को बचाने के लिए तनिक भी चेष्टा नहीं की, और जब "विभीषण" ने आकर कहा कि दूत को मारना अनीति है, तो हनुमान जी समझ गये कि मुझे बचाने के लिये प्रभु ने यह उपाय कर दिया है।

पुरे लंका की कुर्की-जब्ती के बाद हनुमान जी ने अपने को बचाने के लिए तनिक भी चेष्टा नहीं की| CBI, ED, NIA को जैसे इस्तेमाल कर नीतिगत तरीके से सत्ता का हस्तांतरण हुआ, अनीति तो जैसे न्याय की वो निति थी जिससे हनुमान जी समझ गये और समझा के “कि मुझे बचाने के लिये प्रभु ने यह उपाय कर दिया है”।

आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब रावण ने कहा कि बंदर को मारा नहीं जायेगा, पर पूंछ मे कपड़ा लपेट कर, घी डालकर, आग लगाई जाये, तो हनुमान जी सोचने लगे कि लंका वाली त्रिजटा की बात सच थी, वरना लंका को जलाने के लिए मै कहां से घी, तेल, कपड़ा लाता, और कहां आग ढूंढता? पर वह प्रबन्ध भी आपने रावण से करा दिया! जब आप रावण से भी अपना काम करा लेते हैं, तो मुझसे करा लेने में आश्चर्य की क्या बात है?

जब सुभचिंतकों ने महंगाई के मद्देनज़र रावण को लंका में आग लगाने का सुझाव दिया, कपडे में घी लपेटकर उसको लंगोट तक बना दिया, उपद्रव के सामग्रियों के सप्लायर में लड़ाई नहीं हुई, तो विपक्षी एकता का नमूना हर नमूने को स्वीकार होना चाहिए |

इसलिये सदैव याद रखें, कि संसार में जो हो रहा है, वह सब ईश्वरीय विधान है!

सदैव याद रखें|

हम और आप तो केवल निमित्त मात्र हैं।

अफकोर्स

जय श्री राम।

 

 

 

 

           

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