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Showing posts from April, 2020

त्रिकोणीय युद्ध

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क्यों मेरा मस्तिष्क भी जुए का अड्डा नहीं, जो सफल और विफल की परख कर, अपने दाव को मजबूत करते चला जाता है| जब भौतिक समरभूमि में खींचे, पराजित विचारधारा के सिमटते आंकरे| और आदर्श की मरुभूमि में खींचे निरस्त आदर्शों के सिमटते आंकरे| या बौद्धिकता के ठोस सतह पर, समय पर खींचे यथार्थ के आंकरे, वही समय जिसमे दर्ज है, अनेकों विचारधारा और आदर्शों के, हार और जीत, पर सभी यथार्थ को प्रभावित करने में नाकाबिल| आइये देखते हैं, क्यों और कैसे, धूमिल है यथार्थ, इस त्रिकोणीय युद्ध में, कुछ कपोल-कल्पित अतियुक्ति से| तो दोस्तों, गरीबी ख़त्म हो चुकी है, मतलब की अब बस 50 गरीब बचे हैं! उनमे से 10 बच्चे हैं, जिनके गले से लार की गंगा बह रही है| 7 बूढ़े हैं जो अपनी मेहनत से रोज़ जवान हो रहे हैं| 15 जवान गरीब के घर में रेड पड़ी है, और गरीबी रेखा से ऊपर के कई सामान बरामद किये गए हैं, जैसे आलू, और उनके अतरियों में से रिसता घी, जिससे गरीबों की नयी नस्ल तैयार करने की साजिश रचने वाले थे वो| 8 दिहारी भिखमंगे हैं, जिन्हें गरीबी की आदत हो गई है इन्हें प...

गाँव शहर और कोरोना

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गाँव शहर और कोरोना गाँव में सोशल डिस्टेंसइंग आम बात है| एक चौपाल का नक्शा किसी के ध्यान में हो तो उसे पता होगा की लोग अलग-धलग बैठ आपस में चिल्ला कर बात करना अधिक पसंद करते हैं, बजाय की करीब होकर बैठना| जगह की कोई कमी न होने की वजह से दूरी स्वाभाविक नज़र आती है और उनके व्यवहारिक जीवन का हिस्सा भी, करीब आकर धीरे से बात करने का अर्थ यह माना जाता है की आदमी कोई षड़यंत्र बुन रहा है| टेलीविज़न के जगह रेडियो होने से भी लोग हर दिशा में बराबर फैले नज़र आते हैं| ग्रामीण जीवन की बुनाई खटिये की बुनाई की तरह है जिसपे आप स्वछंदता से झूल सकते है, मैट्रेस अभी तक वहां नहीं पहुंचा है| हवाई अड्डा भी वहां से अभी दूर है, और परिणामस्वरूप कोरोना भी| शहरी जीवन भी शायद इसी मुख्य संस्कृति से जन्मी एक उपसंस्कृति है जिसमे छत और आसमान तो बहुत हैं, पर ज़मीन बहुत कम| निजामुद्दीन मरकज एक्सप्रेस  रेल दुर्घटना की खबर अखबार में जब आती है तो एक आदमी उसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है| अगर अखबारों की मानें तो एक आदमी की ट्रेन चलाते वक़्त आँख लग जाती है, जिससे की ट्रेन असंतुलित हो जाती है और पटरी से उतर जात...