त्रिकोणीय युद्ध
क्यों मेरा मस्तिष्क भी जुए का अड्डा नहीं, जो सफल और विफल की परख कर, अपने दाव को मजबूत करते चला जाता है| जब भौतिक समरभूमि में खींचे, पराजित विचारधारा के सिमटते आंकरे| और आदर्श की मरुभूमि में खींचे निरस्त आदर्शों के सिमटते आंकरे| या बौद्धिकता के ठोस सतह पर, समय पर खींचे यथार्थ के आंकरे, वही समय जिसमे दर्ज है, अनेकों विचारधारा और आदर्शों के, हार और जीत, पर सभी यथार्थ को प्रभावित करने में नाकाबिल| आइये देखते हैं, क्यों और कैसे, धूमिल है यथार्थ, इस त्रिकोणीय युद्ध में, कुछ कपोल-कल्पित अतियुक्ति से| तो दोस्तों, गरीबी ख़त्म हो चुकी है, मतलब की अब बस 50 गरीब बचे हैं! उनमे से 10 बच्चे हैं, जिनके गले से लार की गंगा बह रही है| 7 बूढ़े हैं जो अपनी मेहनत से रोज़ जवान हो रहे हैं| 15 जवान गरीब के घर में रेड पड़ी है, और गरीबी रेखा से ऊपर के कई सामान बरामद किये गए हैं, जैसे आलू, और उनके अतरियों में से रिसता घी, जिससे गरीबों की नयी नस्ल तैयार करने की साजिश रचने वाले थे वो| 8 दिहारी भिखमंगे हैं, जिन्हें गरीबी की आदत हो गई है इन्हें प...