त्रिकोणीय युद्ध



क्यों मेरा मस्तिष्क भी जुए का अड्डा नहीं,
जो सफल और विफल की परख कर,
अपने दाव को मजबूत करते चला जाता है|

जब भौतिक समरभूमि में खींचे,
पराजित विचारधारा के सिमटते आंकरे|
और आदर्श की मरुभूमि में खींचे
निरस्त आदर्शों के सिमटते आंकरे|

या बौद्धिकता के ठोस सतह पर,
समय पर खींचे यथार्थ के आंकरे,
वही समय जिसमे दर्ज है,
अनेकों विचारधारा और आदर्शों के,
हार और जीत, पर सभी यथार्थ को
प्रभावित करने में नाकाबिल|

आइये देखते हैं, क्यों और कैसे,
धूमिल है यथार्थ, इस त्रिकोणीय युद्ध में,
कुछ कपोल-कल्पित अतियुक्ति से|

तो दोस्तों, गरीबी ख़त्म हो चुकी है,
मतलब की अब बस 50 गरीब बचे हैं!
उनमे से 10 बच्चे हैं,
जिनके गले से लार की गंगा बह रही है|
7 बूढ़े हैं जो अपनी मेहनत से रोज़
जवान हो रहे हैं|
15 जवान गरीब के घर में रेड पड़ी है,
और गरीबी रेखा से ऊपर के कई सामान
बरामद किये गए हैं,
जैसे आलू, और उनके अतरियों में से रिसता घी,
जिससे गरीबों की नयी नस्ल तैयार करने की
साजिश रचने वाले थे वो|
8 दिहारी भिखमंगे हैं, जिन्हें गरीबी की आदत हो गई है
इन्हें पैसे दो तो साफ़ इनकार कर देते हैं|  
9 को चुनाव में वोट के बदले 2 कमरे का मकान मिला था,
क्योंकि अब लोग अमीर हुए हैं,
तो वोट की कीमत में भी इजाफा हुआ है|
और इजाफा हुआ है, चुनाव के खर्चे में,
जिसकी मदद से 1 बचा गरीब,
आज टेलीविज़न पर खुद को फ़क़ीर कहता है|

निराशा ख़त्म हो चुकी है
बस कुल 50 निराशावादी बचे हैं
15 की खून की सैंपल,
अमेरिका जांच के लिए भेजी गयी है,
जिनमे से 8 अवसाद के शिकार है,
और 7 को नींद की कमी है|
संसाधन आशावादियों का है,
क्योंकि भविष्य उनका है,
और निराशा वर्त्तमान का संकट मात्र,
12 देशद्रोही इस आज का झंझट मात्र|
10 का आपस में निराशा मात्र का ताल्लुक़,
जिन्हें आशावादियों की,
एक मामूली भीड़ रौंद सकती है|
और जो कुल 12 निराशावादी,
कलाकार की तरह जो कबूल हुए,
कहते हैं बस उस बचे 1 की कहानी,
खुदख़ुशी में जो मकबूल हुए|

अब अमीरी ख़त्म हो चुकी है,
मतलब की बस 50 अमीर बचे हैं,
50 पहियों की डोलती सरकार|
10 शेयर मार्केट के शेर, इतनी हवा,
भरी है जिनकी छातियों में,
जिसके छुटने से, दम घुटता है,
16 का, फिर जो चूसते है, दम,
बाकि 18 पहियों से, तो चलती है सरकार,
विचारधारा, आदर्श और यथार्थ के बचे 3 पहियों पे,
स्वघोषित गरीब, और उसपर आश्रित अमीर,
और निराशावादियों पर|

पर मेरा मस्तिष्क क्या जुए का अड्डा है?
और अगर जीवन ही जीत है, और मृत्यु ही हार,
तो संसार ही जुए का अड्डा है, और मेरा मस्तिष्क,
उससे भिन्न, समरभूमि, मरुभूमि, और ठोस बौद्धिकता,
के त्रिकोणीय युद्ध में, शायद बुद्ध का उपेक्षित वृक्ष है|










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