गाँव शहर और कोरोना


गाँव शहर और कोरोना

गाँव में सोशल डिस्टेंसइंग आम बात है| एक चौपाल का नक्शा किसी के ध्यान में हो तो उसे पता होगा की लोग अलग-धलग बैठ आपस में चिल्ला कर बात करना अधिक पसंद करते हैं, बजाय की करीब होकर बैठना| जगह की कोई कमी न होने की वजह से दूरी स्वाभाविक नज़र आती है और उनके व्यवहारिक जीवन का हिस्सा भी, करीब आकर धीरे से बात करने का अर्थ यह माना जाता है की आदमी कोई षड़यंत्र बुन रहा है| टेलीविज़न के जगह रेडियो होने से भी लोग हर दिशा में बराबर फैले नज़र आते हैं| ग्रामीण जीवन की बुनाई खटिये की बुनाई की तरह है जिसपे आप स्वछंदता से झूल सकते है, मैट्रेस अभी तक वहां नहीं पहुंचा है| हवाई अड्डा भी वहां से अभी दूर है, और परिणामस्वरूप कोरोना भी| शहरी जीवन भी शायद इसी मुख्य संस्कृति से जन्मी एक उपसंस्कृति है जिसमे छत और आसमान तो बहुत हैं, पर ज़मीन बहुत कम|


निजामुद्दीन मरकज एक्सप्रेस 

रेल दुर्घटना की खबर अखबार में जब आती है तो एक आदमी उसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है| अगर अखबारों की मानें तो एक आदमी की ट्रेन चलाते वक़्त आँख लग जाती है, जिससे की ट्रेन असंतुलित हो जाती है और पटरी से उतर जाती है| एक आम वाहन चालक ऐसी घटनाओं से सम्बन्ध भी रखता है और उसके लिए इस विवरण पर विश्वास करना आसान ही नहीं, बल्कि कई मामलों में ज़रूरी भी हो जाता है| पर सच्चाई शायद इस सरल विवरण से अलग हो, ट्रेन दुर्घटना में कई अनेक पहलु होते है, प्रशासनिक लापरवाही भी होती है, जो सहजता से छुपा ली जाती है| लोगों को अपना आरोपी मिल जाता है और विभाग को अपनी सफाई| निजामुद्दीन घटना पर भी मीडिया का विवरण कुछ ऐसा ही है, और शायद इसपे विश्वास करना आसान ही नहीं, बल्कि कई मामलों में जरूरी भी है|

गुलेरिया फार्मूला

एम्स के डायरेक्टर रणदीप गुलेरिया ने कहा है की तनाव दूर करने के लिए टेलीविज़न से दूर रहें| यह भी सोशल डिस्टेंसइंग का एक अंग है| न्यूज़ का मकसद न ही संतुष्टि देना है, और न ही उत्तेजना, पर अब वो शायद हमें दोनों में से किसी एक दिशा में धकेल रही है, और शायद हमें यह पसंद भी है|


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