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Showing posts from May, 2020

आत्म-निर्भर डिमांड-सप्लाई

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भारतीय अर्थव्यवस्था पर अगर आज कोई सिनेमा बने तो उसके शुरुआत में यह ज़रूर लिखा जायेगा की यह सच्ची घटनाओं पर आधारित नहीं है| इस बात का प्रमाण फिल्म देख कर नहीं, बल्कि इस तथ्य से पता चलेगा की भारत की आधी से ज्यादा आबादी इस फिल्म को नहीं देख पायेगी, पर फिर भी यह करोड़ों रूपये का कारोबार करेगी| यह भी कहा जायेगा की इसकी डिमांड जबरदस्त है| विश्लेषक बताएँगे की किन किन किरदारों ने अच्छा अभिनय किया, और क्यों ये और बेहतर हो सकती थी| मिला जुला कर जब यह फ़िल्मी मेला समाप्त होगा तो इंडिया डिमांड सप्लाई के अनोखे रिश्ते से विकास की और अग्रसर दिखेगा| जब तक अर्थव्यवस्था सच्ची घटनाओं पर आधारित नहीं होती है तब तक आर्थिक विकास नहीं होता, आर्थिक वृद्धि ज़रूर हो सकती है| दुर्भाग्य से भारत की वर्तमान राजनीती वृद्धि और विकास, दोनों को विकास बता कर अर्थव्यस्था को सच्ची घटनाओं से और भी दूर ले जा रही है| हमारी अर्थव्यस्था सच्ची घटनाओं और बनावटी आधारों की दूरी को कम नहीं करती, बल्कि दोनों को अलग अलग समस्या बता कर जिम्मेदारियां बाँट लेती है| एक मिश्रित ढांचा जिसमे वृद्धि निजी एजेंटों के जिम्मे जाता ह...

चूहा और हाथी

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कौलेज के दिनों में एक मित्र से अक्सर यह बहस छिड़ी रहती थी अर्थव्यवस्था और राजनीती में से कौन सा शास्त्र ज्यादा महत्वपूर्ण है| मालूम होता था की एक पहिया राजनीती का है, और एक पहिया अर्थव्यवस्था का, और इस प्रकार देश की साइकिल आगे बढती है| पर असल सवाल ये नहीं थी, असल सवाल था की यह साइकिल चलाता कौन है| देश के सबसे उम्दा परीक्षा से चुने हुए लोग इसे चलाते रहे, और निति-निर्माता इसके मैकेनिक साबित हुए| अब सवाल हुआ की लोकतांत्रिक व्यवस्था से चुने हुए प्रतिनिधि कौन से चक्के के पंक्चर को चेप लगा लगा कर साइकिल घसीटते रहे, और किस चक्के को हर मौके पर रिपेयरिंग कर चमकाया जाता है, किसे चूहे की खुराक मिली और किसे हाथी की? आज मेनस्ट्रीम मीडिया में क्राइसिस, असमानता, वेलफेयर स्टेट, टैक्स, डेफिसिट फाइनेंसिंग, इन्वेस्टमेंट, प्रोडक्शन, लेबर, माइग्रेशन आदि शब्द ने सियासत, दैनिक एजेंडा, वारफेयर, हॉर्स ट्रेडिंग, संविधानिक-असंविधानिक, आरोप-प्रत्यारोप जैसे शब्दों को बिलकुल ही गायब कर दिया है| अख़बारों के भीतर के पन्नो में छिपे शब्द पहले पन्ने पे आ गए है, और पहले पन्ने के शब्द गायब हो चुके हैं| हालाँकि मौजू...

मनुष्य और आधुनिक समाज- मजदूर दिवस विशेष

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इस बात से शायद ही कोई इंकार करेगा की मनुष्य समाज से पहले पैदा हुआ| समाज की नीव उसने रखी| अपनी कल्पना शक्ति और विश्लेष्णात्मक क्षमताओं से उसने समाज का निर्माण किया जिसमे कोई भी मनुष्य अपने परिश्रम से गुज़र बसर कर सकता है| मिला जुला कर समाज वो ढांचा बना जिसका पहिया परिश्रम हुआ और जिसका इंजन मजदूर| वक़्त के अंतहीन इंधन ने आज हजारों साल बाद आधुनिक समाज को जन्म दिया है| ऐसा मुमकिन है की हमारी कल्पना हमसे कहीं आगे निकल जाए, समाज के विकास का यह एक अंग है, सामूहिक कल्पना से एक समाज सपने देखता है और उसे पूरा करता है| जाहिर है समाज का हर व्यक्ति उस सपने में स्वयं को देखता है, क्योंकि उसमे सबका परिश्रम शामिल है| आधुनिक समाज जिस सपने से निर्मित हुआ है, उसमे उसके कई निर्माता पीछे छूट गए| हालाँकि यह सपना पूरा हो गया, पर कई लोगों के लिए यह कुस्वप्न साबित हुआ| तो क्या आधुनिक समाज का यही सत्य है, की लोग सामूहिक तौर पर जब तक किसी एक सत्य तक पहुंचे, सामाजिक   सत्य उसने कहीं आगे निकल चुका हो, और क्या इस आधुनिक समाज के पीछे भागने से हम उस सत्य तक पहुच सकते हैं? अगर इसकी प्रवृति ही सत्य का छल पै...