चूहा और हाथी


कौलेज के दिनों में एक मित्र से अक्सर यह बहस छिड़ी रहती थी अर्थव्यवस्था और राजनीती में से कौन सा शास्त्र ज्यादा महत्वपूर्ण है| मालूम होता था की एक पहिया राजनीती का है, और एक पहिया अर्थव्यवस्था का, और इस प्रकार देश की साइकिल आगे बढती है| पर असल सवाल ये नहीं थी, असल सवाल था की यह साइकिल चलाता कौन है| देश के सबसे उम्दा परीक्षा से चुने हुए लोग इसे चलाते रहे, और निति-निर्माता इसके मैकेनिक साबित हुए| अब सवाल हुआ की लोकतांत्रिक व्यवस्था से चुने हुए प्रतिनिधि कौन से चक्के के पंक्चर को चेप लगा लगा कर साइकिल घसीटते रहे, और किस चक्के को हर मौके पर रिपेयरिंग कर चमकाया जाता है, किसे चूहे की खुराक मिली और किसे हाथी की?

आज मेनस्ट्रीम मीडिया में क्राइसिस, असमानता, वेलफेयर स्टेट, टैक्स, डेफिसिट फाइनेंसिंग, इन्वेस्टमेंट, प्रोडक्शन, लेबर, माइग्रेशन आदि शब्द ने सियासत, दैनिक एजेंडा, वारफेयर, हॉर्स ट्रेडिंग, संविधानिक-असंविधानिक, आरोप-प्रत्यारोप जैसे शब्दों को बिलकुल ही गायब कर दिया है| अख़बारों के भीतर के पन्नो में छिपे शब्द पहले पन्ने पे आ गए है, और पहले पन्ने के शब्द गायब हो चुके हैं| हालाँकि मौजूदा सरकार के डिजिटल मेनस्ट्रीम मीडिया में अभी भी हिन्दू-मुस्लमान-पकिस्तान जैसे शब्द सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है, पर यहाँ भी कई रोज़गार जाने वाले हैं|

पत्रकारों का खासी दिक्कत हुई होगी, क्योंकि उन्हें कई किताब खोलने पड़े जिनपे धुल जम चुकी थी, पर नेताओं को और मुश्किल हुई क्योंकि उनके पास ऐसे कोई किताब है ही नहीं| एनटायर पोलिटिकल साइंस में भी इस चक्के का पंक्चर बनाना ही सिखाया गया है, पर जब चक्का जगह जगह से फट जाये तो साइकिल कंधे पे उठाने की नौबत आ जाती है| एक चक्के पे कोई साइकिल नहीं चलती|

टेलीविज़न पे अब असली आर्थिक और सामाजिक विशेषज्ञ आ चुके है, पर न्यूज़रूम की चिंता बढ़ी है की मिडिल क्लास बोर न हो जाएँ| ऐसे भारी भरकम शब्द सुनकर वो कपिल शर्मा की चटकीले चुटकुले सुनने न चले जाए| न्यूज़ चैनल वाले आग्रह कर रहे है की रिमोट को ज्यादा न छुएं| पर अब मध्यम वर्ग बोर होने वाला नहीं है, क्योंकि उनकी जेब में भी हाथ डाला गया है|

सीजनल बेरोज़गारी में एक विपक्ष के नेता ने आर्थिक विशेषज्ञों का साक्षात्कार भी किया| सवाल हुआ की जब फिल्म अभिनेता नेता का इंटरव्यू ले सकते हैं तो नेता अर्थशाष्त्री का क्यों नहीं| बल्कि इस इंटरव्यू पॉलिटिक्स की कवायद को प्रशाशन में भी लागू किया है, और आज वी.सी की नियुक्ति का साक्षात्कार नेता लेते हैं, और विद्यार्थियों और सरकारी नौकरशाह की भर्ती का साक्षात्कार राजनैतिक कार्यकर्ता| खबर तो यह भी है की प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार का साक्षात्कार उनके मीडिया सलाहकार लेते हैं|

इन सब में अच्छी खबर यह है की मीडिया का संतुलन उसे वापिस मिल सकता है| जहाँ राजनीती के दबदबे से ग्रषित मीडिया अब अर्थव्यवस्था से दबा हुआ है, मुमकिन है इन दोनों शाश्त्रों में कोई समझौता हो| मुमकिन यह भी है की मीडिया का शोर कम होने सी मिडिल क्लास की बोरियत थोरी बढ़ सकती है, पर यह अर्थव्यवस्था और राजनीती दोनों के लिए अच्छा संकेत है|

मेरे और मेरे मित्र का सवाल आज भी ज्यों का त्यों परा हुआ है पर एक बात पर सहमती आज भी है की पश्चिमी देशों की तरह अगर हम भी राजनीती और अर्थव्यवस्था को स्वतंत्र छोड़ दें तो दोनों के कंडम होने की संभावनाएं बढ़ जाती है| अपने इस परिस्थिथि की बात भले ही पश्चिमी देश हमसे न करे, क्योंकि हम लीग से बाहर के देश हैं, परन्तु हम इससे वक़्त रहते सिख ले सकते हैं की इन दोनों ढांचों का आपस में जुड़ा रहना हमारे लिए महत्वपूर्ण है, और मीडिया के समकालीन दौर से ही सही, मिडिल क्लास इस सत्य तक पहुँच सकता है| लम्बे दौर में देश की सबसे उम्दा परीक्षा में भी इस महत्व को गाढ़ा किया जाने की ज़रूरत है| 

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