मनुष्य और आधुनिक समाज- मजदूर दिवस विशेष


इस बात से शायद ही कोई इंकार करेगा की मनुष्य समाज से पहले पैदा हुआ| समाज की नीव उसने रखी| अपनी कल्पना शक्ति और विश्लेष्णात्मक क्षमताओं से उसने समाज का निर्माण किया जिसमे कोई भी मनुष्य अपने परिश्रम से गुज़र बसर कर सकता है| मिला जुला कर समाज वो ढांचा बना जिसका पहिया परिश्रम हुआ और जिसका इंजन मजदूर| वक़्त के अंतहीन इंधन ने आज हजारों साल बाद आधुनिक समाज को जन्म दिया है|

ऐसा मुमकिन है की हमारी कल्पना हमसे कहीं आगे निकल जाए, समाज के विकास का यह एक अंग है, सामूहिक कल्पना से एक समाज सपने देखता है और उसे पूरा करता है| जाहिर है समाज का हर व्यक्ति उस सपने में स्वयं को देखता है, क्योंकि उसमे सबका परिश्रम शामिल है| आधुनिक समाज जिस सपने से निर्मित हुआ है, उसमे उसके कई निर्माता पीछे छूट गए| हालाँकि यह सपना पूरा हो गया, पर कई लोगों के लिए यह कुस्वप्न साबित हुआ| तो क्या आधुनिक समाज का यही सत्य है, की लोग सामूहिक तौर पर जब तक किसी एक सत्य तक पहुंचे, सामाजिक  सत्य उसने कहीं आगे निकल चुका हो, और क्या इस आधुनिक समाज के पीछे भागने से हम उस सत्य तक पहुच सकते हैं? अगर इसकी प्रवृति ही सत्य का छल पैदा करती है, तो क्यों नहीं बहुसंख्य निर्माता स्वयं को छला महसूस करे?

इस आधुनिक समाज का पारंपरिक ज्ञान यही है की एक गाडी छूट गई तो लोग दूसरी पकर लेंगे, दूसरी नहीं तो तीसरी पर अंत से सब किसी न किसी डब्बे में होंगे| और यह सच भी है, समाज में आज अनगिनत डब्बे है, और हर डब्बे का अपना सत्य है| संघर्ष अपरिहार्य है, उसने मजदूरी के पुराने चक्के को बदल डाला है, और आधुनिक समाज का सबसे बहुमूल्य पुरस्कार संघर्ष है| अगर आप संघर्ष कर रहे है तो आप जीत रहे हैं, वो संघर्ष अपने उत्पाद की कीमत लेने का हो या किसी और के उत्पाद की अदा करने का हो| सभी के पास अधिकार है पर फिर भी कुछ अधिकारहीन, जिनके लिए कोई पटरी नहीं है, जिनके लिए कोई गाडी नहीं आएगी, और जिन्हें किसी भी डब्बे से ठूसा नहीं जा सकता, क्योंकि हर डब्बे की अपनी कीमत है, हर डब्बे का अपना किराया|  

इमानदार मजदूर संघर्ष से नहीं डरता, पर आधुनिक समाज में इमानदार किसी चीज़ से सबसे अधिक डरता है तो वो अपनी इमानदारी से| जिन मूल्यों की कीमत है, वो इमानदारी से हासिल करना मुश्किल है, जो इमानदारी से हासिल हो, उसकी कोई कीमत नहीं| हर डब्बे के अपने सत्य है, सबकी अपनी शर्तें, सबकी अपनी कीमत, सबका अपना किराया| इमानदारी के ठेकेदार जिन डब्बो में है, उसमे अब एक और इमानदार ठेकेदार की जगह नहीं| जिनका सरोकार बेईमानी से है, वो मूल्यों की कीमत तय करते हैं, जिन्होंने पटरी बिछाई है, वो हर डब्बे से किराया लेते है| कभी मजदूर वर्ग जवानी में सेवानिवृत कर दिया जाता है, क्योंकि उसके परिश्रम की कीमत आधुनिक समाज की अपनी जरूरतों में खर्च की जा चुकी है|

आधुनिक समाज की अपनी जरूरतें, उसकी अपनी चेतना और उसका अपना पारंपरिक ज्ञान| मजदूर दिवस के इस मौके पे हमें निश्चित ही यह सोचना चाहिए की क्या मनुष्य सच मुच समाज से पहले का है, और अगर है, तो क्या आधुनिक समाज की सामूहिक कल्पना ही उसपे हावी है? आज लोग मजदूर के कुस्वप्न को कपोल-कल्पित कह दें, पर जो सत्य इन मजदूरों तक नहीं पहुच पाता है, उनमे अपने परिश्रम और संघर्ष में उस सत्य को बदलने की क्षमता है| अधिकारहिनो की चेतना का सत्य पर कब्ज़ा होगा और कुछ नइ शर्तों से इन डब्बो के अधिकारों का पुर्न्वित्रण भी निश्चित है| आधुनिक समाज कभी भी इस सत्य को न समझने के दुखों से नहीं बच सकता|





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