प्रतियोगिता के इर्द-गिर्द एक भयंकर भीड़


एक बाबु सरकारी पैसे से विदेश गए| इस यात्रा के लिए नौकरशाही ने एक भिन्न स्कालरशिप पेश की, इसमें अगर आप भारतीय शिक्षा लेकर विदेश जाते हो, और पश्चिमी शिक्षक बन कर वापिस आते हो तो आपको देश में विशेष स्थान मिलता है, यह स्थान पुरे देश में विदेश के लिए विशेष है|

हमारे मालिक तब तक अच्छे है जब तक वो अपने आप को बदलते रहे, और उनके प्रभाव में हम भी निरंतर बदलते रहे| साम्राज्यवाद से उदारवादी और अब  नइ -उदारवादी सोच, जिसे धारण करने के बाद आप स्कालरशिप के पैसे से भी चाय, पकोड़े या देशप्रेम की दुकान खोल सकते हैं| इसमें निकटतम लाभ को लूटने के अवसर प्रदान किये जाते है, इतने निकट जैसे बसों में लिपटे आदमी, किसी आथिक बर्बरता के प्रभाव में एक दुसरे के जेब में हाथ डाल रहे हों|

आपको बता दें की हमारे बाबु नौकरशाही के स्कॉलरशिप पे विदेश पहुच चुके थे| और जब वापिस आये तो उन्होंने भारतीय सिक्षा पद्दति को विभिन्न अंग्रेजी मुहावरों में गालियाँ दी| अब वह शिक्षक बन चुके थे, और सिक्षा की नीति में विशेष स्थान पर थे| भारतीय शिक्षकों और प्राधयापकों से उनका परिचय हुआ, बाबु ने बताया की बाल की बची हुई खाल को क्लासरूम से बाहर ही रखे, अगर ज्यादा जरुरत हो तो उसे प्रिंसिपल रूम में घुसा दें, ताकि विद्यार्थी उससे दूर ही रहे|

शिक्षक ने विरोध किया की बाल की खाल ही तो विद्यार्थियों का पंक्तियों के बिच में देखना सिखाएगी! बाबु ने बोला की पंक्तियों के बिच वाले मुहावरे केंद्र में तय हो चुकी है, अब आप बस कृपा कर को पंक्तियाँ पढना सिखा दें| भारतीय शिक्षक ने अंत में बिच वाले मुहावरे पेश किये ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ अँगरेज़ ने बोला, मन मुग्द, तो लोटे में समुन्द्र’| भारतीय शिक्षक ने तैश मे पूछा आप कौन से कक्षा के शिक्षक है, बाबु ने नम्रता से बोला हम सभ्यता के शिक्षक है|

सभ्यता की बाल

अँगरेज़ ने एक सुपरहिट करतब देखा था, जिसे वो लोगों को दिखाना चाह रहा था, इस करतब को देखने के लिए एक मामूली से भीड़ ही जमा हुई| पर बाबु को एक भयंकर भीड़ को मामूली बनाना था, न की एक मामूली भीड़ को भयंकर, और उनका यह सुपरहिट करतब ऐसा करने के उनकी सहायता करता है| क्रमशः उन्हें एक शिक्षित और भयंकर भीड़ बनाने की आवश्यकता नज़र आई, और ऐसी आवश्यकता ही नीति के प्रेरणा है|

भारतीय व्यवहारिकता स्वयं में ही एक भयंकर भीर जमा करने की ताक़त रखती हैं, और इसी कारण यह भीड़ भीतर से ही काबू रखती है, स्वनिर्मित भीड़ को बाहर से काबू नहीं किया जा सकता है, इसमें दखल करना मुश्किल है, और मालिकों को ऐसी असभ्य अराजकता नहीं जंचती| जरुरी है की इसके केंद्र के एक करतब हो, जिसे देख कर भयंकर भीड़ जमे, जिसमे गैर-मामूली होने का एक भ्रम भी हो, जिसके भीतर से एक मामूली और मेहनतकश भीड़ निकले|

बाबु का सुपरहिट आइटम प्रातियोगता को बढ़ावा देती है, केंद्र में जमी प्रतियोगिता अपने इर्द-गिर्द भीर को बढ़ावा देती और यह अवसरवादी, उतावली भीर नए उदारवादी समाज का आधार भी बनती है| यह भीड़ मालिकों को प्रिय है, क्योंकि इसे काबू किया जा सकता है, काटा और छांटा जा सकता है| इसमें लीडरी करने वाले मुख्य नेता-जन भी मालिकों के हिमायती होते हैं| इसलिए बाबु नीति विभाग में एक विशेष स्थान पर थे| भीर को असंगत, तत्वहीन, जोशीला बना कर उसमे जरुरत के अनुसार कांट-छांट करने की ताक़त एक मामूली से करतब में होती है, जो (शुरुआत मे) एक भयंकर भीर से ही पैदा करता है|

 ऐसी मजेदार भयंकर भीड़ के लिए निकटतम लाभ बांटे भी जाते हैं, यह लाभ जो बाबु हमें देते हैं उसे एक सामूहिक उपलब्धि ही समझना चाहिए, जो हर व्यक्ति को उसके निजी मोल-भाव की क्षमता के रूप में प्राप्त होती है| लोकतांत्रिक नइ-उदारवादी व्यवस्था में निष्पक्ष अवसर प्रदान किये जाते हैं, जिसे आदमी अपनी स्वयं की मोल-भाव की क्षमता से हासिल कर सकता है, और यह ही प्रतियोगिता है, प्रत्येक व्यक्ति की योग्यता|

सभ्यता के बाल की खाल

भौतिक समाज में मजदूर की क्षमता पूर्ती (self-actualization) उसके मोल भाव करने की क्षमता पूर्ती है| विकल्प के भ्रम से प्रतियोगिता पैदा करने वाला वर्ग इसी प्रतियोगिता को अपनी पूंजी का विस्तार समझता है, और विकल्पों पे कब्ज़ा होने के कारण यह सीधे प्रतियोगिता पर कब्ज़ा करते है, जिससे मोल भाव की क्षमता को नुक्सान होता है|

सिक्षा व्यवस्था योग्यता और रोज़गार के विकल्प में समानता नहीं ला पा रही थी, इस कारण बाबु ने योग्यताओं को औद्योगिक विकल्पों के अनुसार ढालने के लिए नयी निति को नई-उदारवादी प्रतियोगिता बना दिया| यह भी कहा की इससे सेल्फ-एक्चुअलाईजेशन में सहायता मिलेगी, जैसा की वो विदेश में देख कर आये हैं|

प्रतियोगिता का बाज़ार भीड़ को नियंत्रित कर लेता है, और यह उस अराजक भीड़ से बेहतर है जो स्वयं अपना बाज़ार बनाने निकले हैं| ऐसे बाज़ार की कल्पना करना मुश्किल है, जिसमे सभी अपनी क्षमता और जरूरतों के मोल-भाव से संगठित हों|

पर ऐसी व्यवस्था जिसमे बाज़ार की ज़रूरतों से आदमी की क्षमता का आकलन हो, प्रतियोगिता द्वारा ही हासिल की जा सकती है| निकट के लाभ सामूहिक मोल-भाव की गुंजाईश को ख़त्म कर देते हैं, और जिसे मिले वो इस लाभ को अपनी निजी उपलब्धि समझ सकता है, जो की विकल्प और प्रतियोगिता द्वारा निर्मित एक सामूहिक भ्रम का एक निजी हिस्सा बन कर रहेगा|

सिक्षा ही क्यों?

सिक्षा की परिभाषा में समाज के आर्थिक-सामाजिक तत्त्व शामिल होते हैं, जैसे की इस समाज का शिक्षित व्यक्ति उस समाज में जा कर असिक्षित कहा जायेगा, जहाँ सिक्षा की परिभाषा कुछ और है| बाबु को भी विदेश में ऐसा अनुभव हुआ की उनकी मोल-भाव की क्षमता गिरती जा रही है, क्योंकि वह सामाजिक-आर्थिक ढांचा बाबु की सिक्षा को पहचानने से इनकार कर रहा है, वहां सिक्षा की परिभाषा में संसाधनों के तत्त्व हैं, और संसाधनों के मालिक के भी| वहीँ हमारे देश की भीड़ असिक्षित, स्वनिर्मित और अराजक है, जो इन नए मालिकों का नहीं पसंद| जरुरी है की सिक्षा संसाधनों के सन्दर्भ में परिभाषित हो, और उन संसाधनों के मालिकों के सन्दर्भ में भी|

पर प्रतियोगिता द्वारा संसाधनों का समान वितरण नहीं हो सकता, और अगर सिक्षा की परिभाषा में संसाधनो के पूर्न्वित्रण से जुड़े संघर्ष के तत्त्व नहीं हैं तो वो सामाजिक आर्थिक ढांचे में बदलाव नहीं लाते, बल्कि निकटतम लाभ का भ्रम पैदा कर केन्द्रित पूंजी का विस्तार करते हैं|

और उस केंद्र के पसंदीदा मुहावरे वाक्यों के बीच में घर करें, और शिक्षक बस वाक्यों को पढना, लिखना और जोड़ना सिखाता रहे, यह प्रतियोगिता के अनुकूल माहौल है| इस निति के चरम पर सेल्फ-एक्चुअलाईजेशन बाज़ार द्वारा मिल रही कीमत को ही कहा जायेगा, और मोल-भाव प्रतियोगिता के आधुनिक उदारवादी तकनीक के माध्यम से होगा, जैसे आज केन्द्रित संसाधनों के माध्यम से होता है|



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