विस्तार के इस पार

 


विस्तार के इस पार, क्यूँ जागती है नींद

खिलखिलाती, अपरूप, नग्न, सत्य सी अधजगी,

न्याय सी मुर्छित, खोय हुए परवाह सी,

विस्तार के इस पार, क्यों जागती है नींद ?

 

दिन के आने का इल्म तो है,

पर बहती हुई स्याही, सुख जाती है

क्यों भला? और जागती है क्यों कलम

विस्तार के इस पार?

 

क्यों समय नहीं थमता, विस्तार के इस पार,

क्यूँ भेदती है सुन्य, इस व्यापार को,

और थम सा जाता है हर एक आकार,

विस्तार के इस पार?

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