पहाड़ों की रानी : मसूरी
देहरादून से शुरू होते सर्प-नुमा रास्ते आधे घंटे में मुझे मसूरी पहुंचा देते हैं, मानो जैसे स्लो पॉइजन, सर्र-सर्र करती हवाएं धीरे धीरे नसों में घुसती और कितने ही मनोरम आलोकों से गुजरते, मुझे इस लोक में ला छोड़ती हैं।
जैसे मुंबई को भारत की आर्थिक राजधानी कहा जा सकता है, शिमला-मसूरी को हनीमून कैपिटल भी कह सकते हैं। अगर इस अर्थव्यवस्था में भी हनीमून पर जाने का अवसर प्राप्त हो तो मैं मसूरी ही जाना चाहूंगा।
मेरे अनुभव के ब्रीफकेस में ना कोई चुनाव जीतने वाला बजट है, ना ही किसी फ़क़ीर की कोई झोली, ना ही यह सील्ड ब्रीफकेस है। मेरे इस मिडिल क्लास अनुभव के ब्रीफकेस में बहुत से वर्ग हैं, एक है पका हुआ खाना, रोज़ नहाना, काम पर जाना और लौट के घर आना। पर इस अनुभव से अलग जो भी है वो है एक यात्री का अनुभव। तभी इस यात्रा के बारे में आपको अवगत करा रहा हूँ।
शीर्षक सिर्फ आपको भ्रमित करने के लिए नहीं रखा है, मैं मसूरी की ही बात करूंगा। स्कूल में ऐसे निबंध नही लिख पाया तो आज शीर्षक के माध्यम से दोषमुक्त हो रहा हूँ।
देहरादून बस अड्डे पर प्राइवेट टैक्सी यूनियन के मेंबर्स ने यात्रियों की सहूलियत के लिए इमरजेंसी सेवा शुरू की है, कीमत 380 रुपये, जानकर अच्छा लगा। बस की सेवा के लिए थोड़ा इंतेज़ार करना पड़ता है, पहाड़ों में किसी चीज़ की कोई खास जल्दी नही होती, यह जानकर खुशी हुई। बस राइड की कीमत मात्र 80 रुपये है पर इसका टाइम टेबल कुछ पक्का नही।
कुछ देर में बस आ गयी और टूरिस्टों का सैलाब हर तरफ से निकला। टैक्सी स्टैंड बिल्कुल खाली दिखा। किसी को कोई इमरजेंसी नही। टैक्सी यूनियन के मेरे भाइयों ने कहा की लोग कंजर हो गए है। महँगाई पर बात करने की मेरी इक्षा तो बहुत थी और उनके हालात पर कुछ बुरा भी लगा पर मेरे समक्ष इस प्रतिस्पर्धा और अर्थव्यवस्था के इन हालात में बस की सीट लूटना बहुत ज़रूरी था।
बस पर एक बच्चा अपने पिता के गोद में बड़े ही आराम से बैठा है। एक अंटी ने टिपण्णी की ,'सचमुच राजा का जीवन है बचपन', उनका कहना ठीक ही था। पर मैं नही मानता गोद में राजा की तरह बैठने की कोई उम्र होती है, यह तो बड़े-बड़े लोग भी करते है। किसी भी उम्र में उन्हें जब बाप मिल जाता है तो वो अपने पराक्रम से उनकी गोद में जा बैठते हैं।
कंडक्टर ने पूछा की बच्चा कहीं उल्टी तो नही करेगा, माताजी ने इंकार करते हुए कहा कि ऐसी कोई बात नही। आधे रास्ते में बच्चे ने अपने असली रंग दिखाए पर अब उसे गोद से उतारा नही जा सकता था सो पिता ने सर खिड़की से लटका दिया। एमरजेंसी एग्जिट की यह सुविधा इमरजेंसी सेवा की टैक्सी में कहां उपलब्ध होगी।
बहरहाल बस पहुंची और मैंने होटल की तलाश की। एक होटल अवलेवल मिला, यहां से दृश्य की एक फोटो संलग्न कर रहा हूँ।

टहलने पे अम्बेडकर साहब की एक मूर्ति दिखी जो शून्य की ओर इशारा कर रही है, अक्सर यह मूर्ति बैंकों के सामने लगी होती हैं और उनपर ऊँगली उठाती है। एटीएम तक जाने वाली सड़क पर काम चल रहा है तो यहां कैश उपलब्ध नही है, पर डिजिटल माध्यम से हर काम हो रहा है।
पहाड़ो की खूबसूरती के बारे में काफी कुछ पहले ही कहा जा चुका है, पर यह अनुभव भी शायद जेल के अनुभव जैसा ही है, बिना वहां जाए पूरी तरह से उसे नही समझा जा सकता। तो दूसरों को भेजने से पहले एक बार वहां स्वयं जाएं।
प्रकृति की तरह पहाड़ सभी मायनों में आत्मनिर्भर है, इनमे जंगल भी हैं और जंगल की आग भी। मानव सहजीवी है, भूमंडलीकरण से राष्ट्र भी सहजीवी हैं। एक नारे में वसुधैव कुटुम्बकम और दूसरे में आत्मनिर्भरता, ऐसे द्वंद आपको पहाड़ो में नही देखने को मिलते, इसलिए इसे पैराडाइस कहते है, फूल्स पैराडाइस नही।
इतिहास और पौराणिक कथाओं का एक सौहार्दपूर्ण मिश्रण देवभूमि की विशेषता और मसूरी भी इससे अछूता नही है, पर इन जगहों को आपको स्वयं ही ढूंढना पड़ेगा, मेरी रुचि बस सौंदर्य में है।
नैन-नक्षत्र की श्रेष्ठता तारीफ के काबिल है और यह निश्चित ही प्रेम को प्रभावित करती हैं, क्योंकि इनमें निहित हैं सुंदरता। पर यदि सौंदर्य और कुरूपता के अंतर के सारे नक्षत्र प्रकृति में निहित हैं तो मात्र पहाड़ ही है जो इन सभी की स्थिर अभिव्यक्ति है, यह विचलित नही है क्योंकि इसमें प्रकृति की सहनशीलता है।
लौटते हुए फिर देहरादून आना हुआ। वापिस दिल्ली आने से पहले यह विराम अच्छा लगता है। इस शहर में राजधानी वाली सारी बातें हैं, आधुनिक इंफ़्रा, सभी सुविधाओं से परिपूर्ण, देहरादून कभी आपको निराश नही करता।
बहुत लोगों को धन्यवाद देना है पर विशेषकर मेरे बस के चालक को, उन्होंने सर्प-नुमा रास्ते पर बड़ी सावधानी और संयम से ड्राइव किया। वह कोई महामानव तो नही थे, पर अपना काम बखूबी जानते थे, अपने कृत्य के लिय खुद जिम्मेदार थे। ऐसे चालक हों तो सफर वाक़ई आसान हो जाता है।
जैसे मुंबई को भारत की आर्थिक राजधानी कहा जा सकता है, शिमला-मसूरी को हनीमून कैपिटल भी कह सकते हैं। अगर इस अर्थव्यवस्था में भी हनीमून पर जाने का अवसर प्राप्त हो तो मैं मसूरी ही जाना चाहूंगा।
मेरे अनुभव के ब्रीफकेस में ना कोई चुनाव जीतने वाला बजट है, ना ही किसी फ़क़ीर की कोई झोली, ना ही यह सील्ड ब्रीफकेस है। मेरे इस मिडिल क्लास अनुभव के ब्रीफकेस में बहुत से वर्ग हैं, एक है पका हुआ खाना, रोज़ नहाना, काम पर जाना और लौट के घर आना। पर इस अनुभव से अलग जो भी है वो है एक यात्री का अनुभव। तभी इस यात्रा के बारे में आपको अवगत करा रहा हूँ।
शीर्षक सिर्फ आपको भ्रमित करने के लिए नहीं रखा है, मैं मसूरी की ही बात करूंगा। स्कूल में ऐसे निबंध नही लिख पाया तो आज शीर्षक के माध्यम से दोषमुक्त हो रहा हूँ।
देहरादून बस अड्डे पर प्राइवेट टैक्सी यूनियन के मेंबर्स ने यात्रियों की सहूलियत के लिए इमरजेंसी सेवा शुरू की है, कीमत 380 रुपये, जानकर अच्छा लगा। बस की सेवा के लिए थोड़ा इंतेज़ार करना पड़ता है, पहाड़ों में किसी चीज़ की कोई खास जल्दी नही होती, यह जानकर खुशी हुई। बस राइड की कीमत मात्र 80 रुपये है पर इसका टाइम टेबल कुछ पक्का नही।
कुछ देर में बस आ गयी और टूरिस्टों का सैलाब हर तरफ से निकला। टैक्सी स्टैंड बिल्कुल खाली दिखा। किसी को कोई इमरजेंसी नही। टैक्सी यूनियन के मेरे भाइयों ने कहा की लोग कंजर हो गए है। महँगाई पर बात करने की मेरी इक्षा तो बहुत थी और उनके हालात पर कुछ बुरा भी लगा पर मेरे समक्ष इस प्रतिस्पर्धा और अर्थव्यवस्था के इन हालात में बस की सीट लूटना बहुत ज़रूरी था।
बस पर एक बच्चा अपने पिता के गोद में बड़े ही आराम से बैठा है। एक अंटी ने टिपण्णी की ,'सचमुच राजा का जीवन है बचपन', उनका कहना ठीक ही था। पर मैं नही मानता गोद में राजा की तरह बैठने की कोई उम्र होती है, यह तो बड़े-बड़े लोग भी करते है। किसी भी उम्र में उन्हें जब बाप मिल जाता है तो वो अपने पराक्रम से उनकी गोद में जा बैठते हैं।
कंडक्टर ने पूछा की बच्चा कहीं उल्टी तो नही करेगा, माताजी ने इंकार करते हुए कहा कि ऐसी कोई बात नही। आधे रास्ते में बच्चे ने अपने असली रंग दिखाए पर अब उसे गोद से उतारा नही जा सकता था सो पिता ने सर खिड़की से लटका दिया। एमरजेंसी एग्जिट की यह सुविधा इमरजेंसी सेवा की टैक्सी में कहां उपलब्ध होगी।
बहरहाल बस पहुंची और मैंने होटल की तलाश की। एक होटल अवलेवल मिला, यहां से दृश्य की एक फोटो संलग्न कर रहा हूँ।

टहलने पे अम्बेडकर साहब की एक मूर्ति दिखी जो शून्य की ओर इशारा कर रही है, अक्सर यह मूर्ति बैंकों के सामने लगी होती हैं और उनपर ऊँगली उठाती है। एटीएम तक जाने वाली सड़क पर काम चल रहा है तो यहां कैश उपलब्ध नही है, पर डिजिटल माध्यम से हर काम हो रहा है।
पहाड़ो की खूबसूरती के बारे में काफी कुछ पहले ही कहा जा चुका है, पर यह अनुभव भी शायद जेल के अनुभव जैसा ही है, बिना वहां जाए पूरी तरह से उसे नही समझा जा सकता। तो दूसरों को भेजने से पहले एक बार वहां स्वयं जाएं।
प्रकृति की तरह पहाड़ सभी मायनों में आत्मनिर्भर है, इनमे जंगल भी हैं और जंगल की आग भी। मानव सहजीवी है, भूमंडलीकरण से राष्ट्र भी सहजीवी हैं। एक नारे में वसुधैव कुटुम्बकम और दूसरे में आत्मनिर्भरता, ऐसे द्वंद आपको पहाड़ो में नही देखने को मिलते, इसलिए इसे पैराडाइस कहते है, फूल्स पैराडाइस नही।
इतिहास और पौराणिक कथाओं का एक सौहार्दपूर्ण मिश्रण देवभूमि की विशेषता और मसूरी भी इससे अछूता नही है, पर इन जगहों को आपको स्वयं ही ढूंढना पड़ेगा, मेरी रुचि बस सौंदर्य में है।
नैन-नक्षत्र की श्रेष्ठता तारीफ के काबिल है और यह निश्चित ही प्रेम को प्रभावित करती हैं, क्योंकि इनमें निहित हैं सुंदरता। पर यदि सौंदर्य और कुरूपता के अंतर के सारे नक्षत्र प्रकृति में निहित हैं तो मात्र पहाड़ ही है जो इन सभी की स्थिर अभिव्यक्ति है, यह विचलित नही है क्योंकि इसमें प्रकृति की सहनशीलता है।
लौटते हुए फिर देहरादून आना हुआ। वापिस दिल्ली आने से पहले यह विराम अच्छा लगता है। इस शहर में राजधानी वाली सारी बातें हैं, आधुनिक इंफ़्रा, सभी सुविधाओं से परिपूर्ण, देहरादून कभी आपको निराश नही करता।
बहुत लोगों को धन्यवाद देना है पर विशेषकर मेरे बस के चालक को, उन्होंने सर्प-नुमा रास्ते पर बड़ी सावधानी और संयम से ड्राइव किया। वह कोई महामानव तो नही थे, पर अपना काम बखूबी जानते थे, अपने कृत्य के लिय खुद जिम्मेदार थे। ऐसे चालक हों तो सफर वाक़ई आसान हो जाता है।
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