भारतीय राजनीती में जूते-चप्पल का गिरता महत्व
आज बुलेट, बैलेट और वॉलेट की राजनीती
और अर्थव्यवस्था में जूते-चप्पल का महत्व कम हो चुका है, और यह एक गंभीर विषय है|
एक दोस्त में अनुसार जूते चप्पल आम आदमी के मुद्दे के प्रतीतात्मक हैं, और जब उसे
किसी राजनेता पर फेका जाता है तो यह जनता के मुद्दों की अभिव्यक्ति है|
यह सच है की गालियाँ जूते चप्पल की जगह
ले रहा है, जिस तरह सोशल मीडिया पर लोग गालियाँ देते हैं, वो चप्पल भांजने की
पालिसी है| पर एक चप्पल 100 गालियों के बराबर का होता है| अर्ताथ एक चप्पल फेकने
वाले की, और 100 गालियाँ देने वाले की|
बदलाब अथवा
विकास
अब राजनेता के मंच और जनता के बीच की
दुरी 1 km की होती है, यह दुरी भारतीय युवा के सीमा और सामर्थ्य को देख कर रखी
गई है, क्योंकि 1 km दूर से चप्पल फेकना किसी की दक्षता नहीं है| कुछ राजनेता
प्रेस कांफेरेस भी शायद इसी डर से नहीं करते|
चप्पल का साइज़
यह विवाद है की फेके गए चप्पल का उत्तम
साइज़ क्या होना चाहिए| जैसा की हमने जाना, जूता
चप्पल एक मुद्दा है, और मुद्दे के साइज़ के अनुसार ही चप्पल का साइज़ होना चाहिए|
मन्दिर से चुराई हुई चप्पल फेकना भी एक तरीका है, पर वो राजनीती में प्रवेश करने
का तरीका है|
चप्पल-जूते का
कारोबार
ध्यान देने योग्य बात है की गालियाँ
देने से गाली का कारोबार बढ़ता है, जिसका GDP में कम योगदान
है, वहीँ चप्पल जूते फेकने से इसका कारोबार बढ़ता है और GDP भी बढती है|
अनशन बनाम चप्पल
विरोध का एक तरीका खाने पिने का त्याग
भी है, पर चप्पल फेकना एक सीधा और सटीक, या यूँ कहें की एक साहित्यिक तरीका है अथवा
लिटरेरी डिवाइस है, वहीँ अनशन एक अकादमिक प्रणाली है|
नारा बनाम
चप्पल
नारे कान तक पहुचते हैं और जूते मुह और
आखों तक, जिन्हें पड़ते हैं उनके भी, और जो देख रहे है उनके भी|
अहिंसा
गोलियों और गालियों को हिंसा कहा जा
सकता है, परन्तु जूते और चप्पल सदा अहिंसक होते है, क्योंकि ये जमीन से जुड़े हैं| जूता और चप्पल सबसे अहिंसक हथियार
है|
पलटवार
ध्यान दिया जाए की गालियों का जवाब
गालियों से दिया जा सकता है, गालियाँ सुनने वाला आदमी हारा हुआ नहीं होता है,
बल्कि उसमे पलट कर गालियाँ देने की प्रवृति प्रबल हो जाती है| वहीँ जिन्हें जूते
पड़ते है वो फेकने वाले पर एक जूता बर्बाद न करें|
इतिहास
अगर इसाई धर्म को देखे तो 1000
BCE में राजा डेविड, जब मेसोपोटामिया के खिलाफ लड़े,
और
जोआब, जो डेविड के सेनापती थे, और जिन्होंने नमक की घाटी में बारह हजार एदोमियों
को मार डाला। इस विवरण पर लेखक कहता है कि ... "एदोम के ऊपर मैं अपना जूता
उतारूंगा”...
359 में कांस्टेंटियस II, रोमन सम्राट, लोगों की
वफादारी जांचने के लिए एक छोटी सी पहाड़ी से लिमिगैंट्स के एक समूह को भाषण दे रहा
था, जब वह उनमें से एक द्वारा फेंके गए जूते से टकराया| फेंकने वाला
चिल्लाया 'मार, मार!’|
ताइवान के लोग प्रशासन और सत्तारूढ़
पार्टी के खिलाफ प्रदर्शन और जूता फेंकने के समर्थन में देश भर में पुराने जूते
दान करते हैं।
जनता चप्पल बनाम
राजनैतिक चप्पल
एक रिसर्च के अनुसार, जिसका होना अभी
बाकी है, जनता ने अपना चप्पल निकलना छोड़ दिया है क्योंकि इस प्रथा को संस्थागत कर
दिया गया है, अब राजनेता एक दुसरे को चप्पल मार कर भी रस्म-अदायगी कर लेते है, पर
गौर करने लायक बात है की जनता हमेशा एक चप्पल फेकती है और राजनेता आपस में जोड़े
में चप्पल फेकते है| यह निश्चित ही एक एजेंडा के तहत होता है|


Comments
Post a Comment